आमतौर पर जब शादियां होती हैं तो एक दूल्हा और एक दुल्हन होती है। मगर क्या शादी के लिए एक मेल और एक फीमेल का होना जरूरी है? अगर दो पुरुष या दो स्त्रियां आपस में शादी कर लें तो क्या दिक्कत हो सकती है? सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ऐसे ही मामले की सुनवाई कर रहा है, जिसमें एक तरफ भारत सरकार है तो दूसरी तरफ एलजीबीटीक्यु प्लस कम्युनिटी है।
तो आइए पुरी कहानी को शुरुआत से समझते हैं। साल 1861 यानी ब्रिटिश रूल के समय एक कानून बनाया जाता है। इंडियन पीनल कोड में धारा 377 को जोड़ा जाता है। जिसके द्वारा समलैंगिकता को अपराध घोषित कर दिया जाता है। इसमें कहा जाता है कि जो भी अपनी मर्जी से किसी पुरुष, महिला या जानवर से प्रकृति के नियमों के खिलाफ जाकर शारीरिक संबंध बनाएगा, उसे आजीवन करावास की सजा दी जाएगी। जब साल 1947 में देश को आजादी मिली और एक नया संविधान बनाया गया तो उसमें भी इस कानून को शामिल कर लिया गया। और सब कुछ पहले जैसा ही चलने लगा। लेकिन इस मामले में एक टर्निंग पॉइंट तब आया जब साल 2001 में नीदरलैंड में समलैंगिकता को मान्यता दे दी गई। इसके बाद भारत में भी समलैंगिक अधिकारों की मांग बढ़ाने लगी। नाज़ फाऊंडेशन इंडिया, दिल्ली में एक गैर सरकारी संगठन है। इसकी स्थापना 1994 में एचआईवी के मुद्दे पर प्रतिक्रिया देकर विभिन्न समुदायों की सेवा करने, रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाने, एचआईवी से पीड़ित बच्चों और लोगों की देखभाल करने और सहायता प्रदान करने तथा साथ ही उनके खिलाफ कलंक और भेदभाव को दूर करने के उद्देश्य के साथ की गई थी साल 2005 में समलैंगिकता को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक पिटीशन फाइल की जाती है, इसी नाज़ फाउंडेशन की तरफ से और 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा समलैंगिक प्रेम संबंधों को अपराध की कृत्य से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसला को बदल दिया जाता है और इसे फिर से अपराध की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता है। साल 2016 में यह मामला 5 सदस्य संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया जाता है। 2018 में संवैधानिक पीठ के निर्णय में दो वयस्कों के संबंध को निजी मान कर धारा 377 के समलैंगिकता वाले प्रोविज़न को अपराध की श्रेणी से हटा दिया जाता है। एलजीबीटीक्यु प्लस कम्युनिटी इसका जोरदार स्वागत करती है और इसे अपने बड़ी जीत बताती है। वहीं बीजेपी इसे देश के लिए खतरा बताती है।
इस फैसला के बाद से ही समलैंगिक विवाह को भी कानूनी मान्यता देने की मांग उठने लगती है। इसे लेकर देश के अलग-अलग अदालतों में 20 याचिकाएं दायर की जाती हैं। नवंबर 2022 में यह मामला तब पुरी तरह से सामने आता है, जब हैदराबाद के गे कपल अभय डांग और सूप्रियो चक्रवर्ती सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन फाइल करते हैं। ये दोनों पिछले 10 सालों से प्रेम संबंध में हैं और अपनी शादी को कानूनी मान्यता दिलाना चाहते हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट सेंट्रल गवर्नमेंट को एक नोटिस जारी करता है और उस पर जवाब मांगता है। इसके बाद 6 जनवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हाई कोट्स के पास पेंडिंग सभी पिटीशन को अपने पास ट्रांसफर कर लेता है। 12 मार्च 2023 को सेंट्रल गवर्नमेंट द्वारा सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली पिटीशन का विरोध किया जाता है सेंट्रल गवर्नमेंट इस मामले में एक एफिडेविट दाखिल करती है और कहती है की विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है यह लोगों की भावनाओं और उनकी संस्कृति से जुड़े मामला है इसलिए कोर्ट को इस मामले पर सनी नहीं करनी चाहिए इस मामले पर कानून बनाने का अधिकार केवल सांसद को है इसलिए इसे सांसद पर ही छोड़ देना चाहिए जिसके बाद 13 मार्च 2023 को सीबीआई चंद्रचूड़ के अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों के पीठ द्वारा इस मामले को संविधान पीठ को सोप दिया जाता है 15 अप्रैल 2023 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पांच जज की बेंच के गठन को नोटिफाई किया जाता है
है और सुप्रीम कोर्ट रोजाना इसकी लाइव स्ट्रीमिंग भी कर रहा है इस मामले में जहां पेटीशनर की तरफ से एडवोकेट मुकुल रोहतक एडवोकेट अभिषेक मनोज सिंह भी मेनका गोस्वामी एडवोकेट अरुंधति कैट दो जैसे सीनरी लॉयर्स हैं वहीं केंद्र सरकार के तरफ से सॉलिड जनरल तुषार मेहता है अब सवाल ये उठाता है की यह मामला इतना बड़ा कैसे हो गया किसी की शादी से भला सरकार को क्या दिक्कत हो शक्ति है एक्चुअली मटर यह है की इंडिया में शादी के लिए तीन तरह के कानून हैं पहले हिंदू मैरिज एक्ट 1955 जो हिंदुओं के पारंपरिक तरीके से विवाह और तलाक जैसे मामलों के लिए है दूसरा स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 जो अंतर जाति है और अंत धार्मिक विवाह और तलाक के लिए है और तीसरा फॉरेन मैरिज एक्ट
में एक बात आम है की शादी के लिए एक बायोलॉजिकल मेल और एक बायोलॉजिकल फीमेल हनी चाहिए इसके साथ ही नेट में और भी एक्स इंटरलिंक है इसलिए अलजेब्राइक क्यों समुदाय को शादी का अधिकार मिलने के लिए जरूरी है की ट्रेडिशनल लॉस में बदलाव किया जाए जिसमें शादी को स्त्री और पुरुष के बीच संबंध माना गया है साथ ही इसे जुड़े अन्य कानून जैसे घरेलू हिंसा गुजरा भट्ट उत्तराधिकार और एयरटेल ड्रॉप आदि में भी बदलाव करना होगा लेकिन इसमें कई सवाल और जटिलताएं सामने आई हैं जैसे अगर एक ही जेंडर के लोग शादी करेंगे तो गुजर भट्ट कौन देगा घरेलू हिंसा में अगर एक ही जेंडर के लोग होते हैं तो इनमें पीड़ित और अभियुक्त पक्ष कौन होंगे ससुराल मायके धन और मैत्री धन क्या होता है इस पर विचार करना पड़ेगा इस तरीके से मैरिटल रेप के प्रधान भी हैं इन पर भी विचार करना पड़ेगा इन सभी बटन का आपस में एक इंटर रिलेशन है जिसके करण पुरी तरह से लीगल स्ट्रक्चर को बदलना पड़ेगी क्योंकि मैरिज डॉ के रूट में मेल फीमेल रिलेशन को साइन किया गया है सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराज गुप्ता कहते हैं की अब अगर इसको मान्यता देनी है तो सिर्फ सांसद के मध्य से ही दी जा शक्ति है कोई कानून गलत है या नहीं फोर्थ ते कर सकता है लेकिन पुरी कानूनी व्यवस्था को बदलने के लिए कोर्ट निर्देश दे तो भी बदलाव सांसद के मध्य से ही संभव है विवाह कानून और उनसे जुड़े मामलों को बदलना होगा तभी सही अर्थो में मांग पुरी हो पाएगी और ये बहुत ही क्रांतिकारी बात होगी वही एलिजिबिलिटी क्यों समुदाय का कहना है की उन्हें शादी का अधिकार मिलन चाहिए नहीं तो यह संविधान के अनुच्छेद 15 16 19 और 21 द्वारा उन्हें दिए गए मूल अधिकारों का उलझन होगा तो यह तो थे टेक्निकल बात है मगर इंडियन सोसाइटी की बात करें तो बात बात पर लड़ने वाली डिफरेंट कम्युनिटी के लोग भी इस मामले में एक साथ दिखे रहे हैं सबका यही कहना है की भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता के लिए कोई जगह नहीं है लेकिन क्या यह सही है इंडिया में समलैंगिकता क्या कभी नहीं रही थी इतिहास के बाद करें तो दुनिया के ज्यादातर संस्कृतियों में समलैंगिकतम मौजूद रहे हैं रोम और यूनान को छोड़ दीजिए ऋग्वेद की ही एक रिचा कहती है की विकृति एवं प्रकृति यानी जो अब प्राकृतिक देखा है वह भी प्राकृतिक है समलैंगिकता और कीनन का उल्लेख रामायण महाभारत से लेकर विशाखा डेट के मुद्राराक्षस और बादशाह्यान के कामसूत्र तक में है हालांकि इन्हें शहर सम्मान की दृष्टि से तो नहीं देखा जाता था लेकिन कहानी भी इनके अपमान का उल्लेख नहीं किया गया है 12वीं साड़ी में 12 मिहिर ने अपने ग्रंथ बृहद जातक में कहा था की समलैंगिक कब पैदाइश होती है इस आदत को बदला नहीं जा सकता है आधुनिक वैज्ञानिक छोड़ों से भी यही पता चलती है की समलैंगिकता अचानक पैदा हुई आदत या विकृति नहीं है बल्कि यह पैदाइशी होती है गुप्त कल में वत सायन ने जब कामसूत्र की रचना की थी तो उन्होंने लिखा था की किस तरह से उनके मलिक सेठ और ताकतवर लोग नौकरों और मालिश करने वाले नालियों के साथ शारीरिक संबंध बना लेते हैं क्वेश्चन मध्यकाल और उसके बाद भारत में तमाम राजवंशों में इससे जुड़े किस खूब प्रचलित रहे हैं अगर खजुराहो के मंदिरों और दीवारों पर बनी तमाम मुद्राओं की मूर्तियां को देखेंगे तो उनमें समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं के चित्रण मिलते हैं वह इस भाव में नजर आते हैं माना जाता है की यह मंदिर में बनाया गया था साहित्य फिल्म प्रिंटिंग एवं अन्य कलाओं में समलैंगिकता का काफी चित्रण हुआ है की कहानी लिहाप में स्त्री समलैंगिकता का पहले बार चित्रण हुआ जिसने उसे जमाने में सनसनी मचा दी थी यह उर्दू कहानी 40 के दशक में प्रकाशित हुई थी इसे अश्लील कार दिया गया और इस पर मुकदमा लाया गया था नागार्जुन के उपन्यास रति नाथ की चाचा में भी समलैंगिकता का चित्रण है पांडे बेचन शर्मा उग्र की आत्मकथा अपनी खबर में युवकों और किशोर के समलैंगिक प्रवृत्तियां का यथार्थ वर्णन मिलता है फिल्म हायर में लेस्बियन संबंधों का खुला चित्र है इसमें सवाना आदमी और नंदिता दास के बीच समलैंगिक सेक्स संबंधों को दिखाए गया है अब सवाल है की जब प्राचीन समय से ही हमारी संस्कृति में समलैंगिकता रही है तो फिर आज का विकसित समाज इसका विरोध क्यों करता है दरअसल आज हम लोग समझेंगे प्रेम संबंधों को सौदोमी से जोड़कर देखने लगे हैं जबकि ऐसा होता नहीं है मधुर भंडारकर की फिल्म चांदनी बार में एक ऐसा दृश्य है जिसे हम समझेंगे तब समझ लेते हैं
क्योंकि एनल सेक्स स्ट्राइक के साथ भी किया जा सकता है इससे स्पष्ट है की समलैंगिकता और एनल सेक्स अलग-अलग चीज हैं इस विषय की जानकारी नहीं रखना वाले समलैंगिकता को एनल सेक्स का पर्याय मां बैठने हैं पर वे लेस्बियनिज्म को भूल जाते हैं जहां पेनिट्रेटिव सेक्स संभव ही नहीं होता है [संगीत]