जहां लोकतंत्र है सरकारों का बनना-बिगड़ना लगा ही राहत है। और इस बने बिगड़ना में कुछ परिवर्तन भी होते ही हैं। सरकार के कामकाज पर पार्टी के विचारधारा का प्रभाव पड़ना भी लाज़मी है। मगर इन सब में एक बात आम है। और वह यह है कि सभी सरकारें दवा करते हैं की उन्होंने कानून का शासन किया है। और हम सभी यही चाहते हैं कि हमारे राज्य, हमारे देश में कानून का शासन बना रहे। मगर कानून के शासन या रूल ऑफ लॉ को लेकर कई साड़ी भ्रांतियां हैं। उनमें से एक यह भी है की न्याय तुरंत होना चाहिए इसमें थोड़ी सी देरी हमें मंजूर नहीं होती। हां ये सच है की न्याय में देरी हमें न्याय से वंचित कर देती है, लेकिन न्याय एक प्रक्रिया है जिसका पालनपुर करना सभ्यता की नींव है।
की जिंदगी में कानून के शासन के क्या मायने हैं। इसे नहीं का सबसे अच्छा तरीका है यह याद करना की जब वो नहीं था तब क्या हुआ था। कानून के राज के पहले जंगल का राज था। जब इंसान जंगल से निकाला और समाज में रहने लगा तब उसे अपने समाज में व्यवस्था कायम रखना के लिए कुछ नियमों की जरूर महसूस हुई। इन्हीं नियमों ने आगे चलकर न्याय व्यवस्था का रूप लिया। कानून का इतिहास सभ्यता का इतिहास से जुड़ा हुआ है। एक तरह से देखा जाए तो सभ्यता की शुरुआत ही कानून से हुई है। और न्याय के लिए कानून का शासन बहुत ही जरूरी होता है। अब जरा इतिहास के पन्नों से निकालकर आज के उत्तर प्रदेश में आईए, जहां गैंगस्टर अतीक अहमद के 19 साल के बेटे असद अहमद के एक पुलिस मुठभेड़ में मारे जान का जश्न मनाया जा रहा है। बीजेपी ने मुठभेड़ की खबर के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विधानसभा में दिया भाषण ट्वीट किया है। जिसमें उन्होंने ऐलान किया था की माफिया को मिट्टी में मिला देंगे म। ट्वीट में लिखा है कि जो कहते हैं, कर दिखाते हैं। स्पष्ट है कि राज्य सरकार इस मुठभेड़ पर गर्व महसूस कर रही है। और यह गर्व का ऐलान इस बात की स्वीकृति है की यह मुठभेड़ इरादा तन था। उत्तर प्रदेश की पुलिस के आला अफसर ने खुद बताया कि यह मार्च 2017 से शुरू हुए आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में पुलिस की 183 वीं मुठभेड़ है या एक ही मामले में पुलिस के कार्यवाही के दौरान की गई तीसरी मुठभेड़ है। और उत्तर प्रदेश द्वारा अप्रैल के 13 दोनों में की गई तीसरी मुठभेड़ भी है। 26 जुलाई 2022 को लोकसभा में देश भर में हुए पुलिस एनकाउंटर का डाटा रखा गया। इस डाटा के अनुसार 2020-21 में कुल 82 पुलिस एनकाउंटर हुए थे, जो 2021 में बढ़कर 151 हो गए। 2000 से 2017 के बीच एनएचआरसी ने एनकाउंटर के 1782 मामलों को फर्जी बताया था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 में पुलिस एनकाउंटर में 64 लोगों की मौत हुई। एनएचआरसी की रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से 2018-19 यानी इस 5 वर्षों में पुलिस एनकाउंटर में क्रमशः 137, 188, 189 169 164 लोगों की जान गई। इस रिपोर्ट के अनुसार पुलिस एनकाउंटर में इन पांच सालों में सबसे ज्यादा मौत उत्तर प्रदेश में हुई है। इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मुताबिक इसके अलावा सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि इन्हीं छह सालों में उत्तर प्रदेश में 546 अपराधी पुलिस कार्यवाही में घायल होने के बाद गिरफ्तार किया गया है। सिर्फ अपराध ही नहीं बल्कि अपराधियों का सफाया आदित्यनाथ का चुनावी वादा था| और वह अपने कई भाषणों और साक्षात्कारों में इसे दोहरा चुके हैं। इसी महीने हिंदी न्यूज़ चैनल आज तक के प्रोग्राम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एंकर ने सवाल पूछा तो आपका तरीका वही रहेगा? गाड़ी पलटेगी?
फिर उन्होंने कहा की प्रदेश में 24 करोड़ जनता की सुरक्षा और सम्मान के लिए कानून का राज कैसे स्थापित होगा यह एजेंसियां तय करेंगी और उसके अनुसार उसे आगे बढ़ाएंगी। फिर एंकर ने पूछा क्या निर्देश है आपका गाड़ी पलटेगी जवाब में योगी ने कहा की देखिए एक्सीडेंट हो सकता है इसमें कौन से दो राय की बात है एक्सीडेंट किसी का भी हो सकता है क्या बात कर रही हैं यौगिक के इस जवाब से दर्शन भी खिलखिला कर हंस और जमकर ताली भी बजाई एक महीने पहले ही हो गया आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में अधिक का नाम लेते हुए कहा था की इस माफिया को मिट्टी में मिला देंगे और आज के ताज खबर यही है की अधिक अमन और उसके भाई अशरफ को 15 अप्रैल की रात पुलिस स्टडी में बाहरी लोगों द्वारा 10 गोलियां मेरी गई जिसमें उसकी मौत हो गई मतलब पुलिस तो पुलिस बाहरी लोग भी अपराधियों को सजा देने लगे हैं जाहिर है पुलिस मुठभेड़ आदित्यनाथ सरकार के लिए आवश्यक राजनीतिक हथकंडा है और अब यह इतना भयंकर रूप ले चुका है की कानून और पुलिस पुरी तरह से फेल हो गया है लेकिन सरकार से बाहर जो लोग इन मुठभेड़ का जश्न माना रहे हैं उनका आखिर क्या स्वार्थ हो सकता है असद और उसके साथ ही गुलाम के मारे जान पर एक पत्रकार ने ट्वीट किया की अपराधी को पालने पहुंचने से बेहतर है की अपराधी खत्म हो जैन एक और पत्रकार ने जो यह कहा की गुलाम को आसन मौत मिली और एक पत्रकार ने तो गुलाम की लास्ट की तस्वीर ट्वीट कर डाली और साथ ही लिखा की जब मौत सामने होती है तो पेशाब छठ जाता है ऐसे में कहां र जाएगा कानून का शासन और कैसे सुनिश्चित होगी एक-एक नागरिक की सुरक्षा कैसे ताकत के नसे में मदमस्त लोगों को यह सबक दिया जा सकेगा की कानून उनसे भी ऊपर है यही रतन मुठभेड़ का जैश नहीं तो और क्या हो सकता है लेकिन ऐसा पहले बार नहीं हो रहा है और यह तन तन मुठभेड़ करने वाली पहले सरकार भी नहीं है बीजेपी के ही मुख्यमंत्री विश्व शर्मा के असम सरकार भी इस तरह की मुठभेड़ के बढ़ते मामलों को लेकर कटघर में खड़ी है जम्मू कश्मीर में तो मुठभेड़ का लंबा इतिहास रहा है पंजाब में भी माना जाता है की मिलिटेंसी का अंत मुठभेड़ के जारी ही किया गया था हैदराबाद में 2019 में एक महिला से बलात्कार उससे जलाकर मार देने के आप का सामना कर रहे कर संदिग्ध तेलंगाना पुलिस की कार्यवाही में इसी तरह मारे गए थे उसे समय भी कई लोगों ने इसी तरह सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर की थी राज्य चाहे कोई भी हो अपराध है किसी का भी हो या किसी किम का हो सरकार चाहे किसी की भी हो लोगों को मुठभेड़ से एक तरह की संतुष्टि मिलती है मुमकिन है की संतुष्टि के जड़ में न्याय व्यवस्था की कमजोरी की वजह से व्यवस्था से लोगों का विश्वास का उठ जाना हो जब मुकदमे मीना सालों और दास पर चलते रहे और न्याय का इंतजार खत्म ही ना हो ऐसे में न्याय व्यवस्था से विश्वास का उठ जाना स्वाभाविक ही है लेकिन विश्वास के उठ जान को मंजूर कर लेना और फिर न्याय के सरहदों को लांघकर उठा जान वाले कदमों को स्वीकृति दे देना बेहद खतरनाक है जो पुलिस अपराधी को गिरफ्तार कर अदालत के सामने लाने की जगह गली मार देती है उसे किसी मासूम को भी गली मार देने में कितना समय ग जाएगा यह भी सोच कर देखिए लॉन्चिंग क्या है क्या सोचकर हमारे और आपके जैसे लोगों का एक समूह किसी व्यक्ति को किसी अपराध के संदेह में पकड़ लेट है और उसे पुलिस के हवाले करने के बजे खुद ही पीठ पीठ कर मार देता है क्या फर्क है लिंचिंग करने वाली इस भीड़ में और फर्जी मुठभेड़ करने वाली पुलिस में मुठभेड़ का जश्न मनाने वाले बताएं की वह कानून के शासन और शासन से किसको चंगे जवाब देने के लिए फिर से इतिहास के पन्नों में लौटना होगा और सोचना होगा की सभ्यता बेहतर है या वापस जंगल राज में जाना सुप्रीम कोर्ट के जान मैन सीनरी वकील दुष्यंत दवे ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा की भारत में एनकाउंटर को सामाजिक वैधता दिलाने की कोशिश की जा रही है और यह बहुत ही खतरनाक है दुष्यंत दवे ने कहा की जब आतंकवादी हमला हो तो इस तरह के एनकाउंटर को सही ठहराया जा सकता है बाकी किसी भी स्थिति में एनकाउंटर को सही नहीं ठहराया जा सकता और ये सारे एनकाउंटर राजनीति से प्रेरित होते हैं दवे कहते हैं नक्सली होने के नाम पर आदिवासियों और दलित का एनकाउंटर मुसलमान का एनकाउंटर हमारे न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल है एनकाउंटर बताता है की हमारे सरकार को भी न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं है न्यायपालिका और मानवाधिकार अयोगी के नींद खुलनी चाहिए यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है अगर हम नहीं जागे तो हालात और भी बटर हो जाएंगे अगर इसे रॉक नहीं गया तो अभी की सरकार किसी और टक को निशाना बना रही है और बाद में दूसरी सरकार आएगी तो किसी और टक को निशाना कर लगी एनकाउंटर बताते हैं की हमारी पुलिस प्रणाली फेल हो गई है और न्यायपालिका में किसी को भी भरोसा नहीं रहा है क्या एनकाउंटर को भारतीय समाज में लोकप्रिय समर्थन मिल रहा है इस सवाल के जवाब में दुष्यंत दबे कहते हैं की यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है और आने वाले समय में इसे रॉक नहीं गया तो पुलिसिया दमन बढ़ेगा जाने-माने वकील और स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर रहे उज्जवल निगम कहते हैं की एनकाउंटर को सामाजिक वैधता और लोकप्रिय समर्थन मिलता है तो यह न्यायपालिका के लिए खतरनाक होगा निगम कहते हैं की आम लोगों में यह भावना है की अपराधियों को सजा नहीं मिलती है और यह न्यायिक जटिलता में उलट जाति है ऐसे में अपराधियों को सीधे मार देना चाहिए लेकिन यह हमारे जिम्मेदारी है की इंसाफ को सुनिश्चित करें नहीं तो एनकाउंटर को लेकर लोकप्रिय समर्थन बढ़ेगा जो की हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होने वाला है [संगीत]